“यूक्रेन में चल रहा है मोदी का युद्ध”, भारत बना टारगेट

हुसैन अफसर
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ब्लूमबर्ग टीवी पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के पूर्व व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने भारत पर कूटनीतिक बम फोड़ा।
उनका कहना है कि भारत, रूस से तेल खरीदकर यूक्रेन युद्ध को फाइनेंस कर रहा है। और हद तो तब हो गई जब उन्होंने इसे “मोदी का युद्ध” कह दिया।

“मोदी एक महान नेता हैं… लेकिन!” – डिप्लोमैटिक स्लैप

नवारो का अंदाज़ बिलकुल वैसा ही था जैसे कोई रिश्तेदार बोले – “तुम अच्छे हो, पर तुम्हारे बच्चों से सिरदर्द है।”
उन्होंने कहा –

“मोदी जी कहते हैं कि भारत में टैरिफ सबसे कम हैं। लेकिन सच्चाई तो कुछ और है।”

नवारो ने दावा किया कि भारत रूसी तेल खरीदकर उसे महंगे दामों पर बेचता है, जिससे अमेरिका को नुकसान होता है।
वो यह तक भूल गए कि भारत अपने खुद के लोगों के लिए सस्ता तेल क्यों नहीं रखता। आखिर, हम “विकासशील देश” हैं, “विकसितों” की तकलीफ़ हम क्यों ढोएं?

“ये मोदी का युद्ध है” – अमेरिका का नया नैरेटिव?

पीटर नवारो बोले – “रूस उस पैसे से यूक्रेनी मारता है। फिर यूक्रेन, अमेरिका और यूरोप से और पैसे मांगता है। यानी हमें मोदी का युद्ध फंड करना पड़ता है।”

अब इस बयान को पढ़कर कुछ भारतीय सोच रहे होंगे — “भाई साहब, युद्ध रूस और यूक्रेन में चल रहा है, और इसे ‘मोदी का युद्ध’ कैसे बना दिया आपने? इतनी दूरदृष्टि तो चंद्रयान-3 में भी नहीं थी!”

भारत: “हमने डिस्काउंट पर खरीदा, भाई!”

भारत ने कभी नहीं छुपाया कि वो रूस से छूट पर तेल खरीद रहा है। और ये डील भारत के आम नागरिकों के फायदे के लिए है, ना कि किसी देश पर हमला करने के लिए। लेकिन शायद अमेरिका को ये बात हज़म नहीं हो रही।

आख़िर में कौन किससे ज़्यादा परेशान है?

  • भारत: सस्ता तेल मिल रहा है।

  • रूस: तेल बिक रहा है।

  • यूक्रेन: संघर्ष में है।

  • अमेरिका: दूसरों की डील से परेशान है।

  • पीटर नवारो: माइक्रोफोन लेकर ब्लूमबर्ग पर गरज रहे हैं।

किसी का तेल, किसी का टैरिफ और किसी का तंज – ये सब मिलकर बनाते हैं आज की इंटरनेशनल राजनीति का नया मसाला।

“मैं तुम्हारी सौतन बोल रही हूं” – और बस, रीता की ज़िंदगी थम गई

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